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इलाज में लापरवाही: एशियन अस्पताल के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित 

फरीदाबाद। लापरवाही: एशियन अस्पताल के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित – एशियन अस्पताल के डाक्टरों के लालच की वजह से एक अमानवीय कृत्य के कारण एक महीला व उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत हो गई। इसके बाद आज गांव नाचौली के सैकडो लोगों ने उपायुक्त के नाम सिटी मजिस्ट्रेट कुमारी बलीना को ज्ञापन सौपा। उपायुक्त ने जांच कमिटी गठित कर दी है।

लापरवाही: एशियन अस्पताल के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित

एशियन अस्पताल के डाक्टरों ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस मौत पर वे भी दुखी हैं। किन्तु अत्यधिक बीमारी से मौत हुई, डाक्टरों की लापरवाही से नहीं।
मृतक श्वेता फरीदाबाद न्यायालय के अधिवक्ता सुनील नागर की भतीजी लगती थी।
सुनील नागर ने कहा कि बुखार से पीडित व गर्भवती भतीजी को फरीदाबाद के एशियन अस्पताल में भर्ती कराया था।

18 लाख का बिल बनाया

इलाज के दौरान उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की भी मौत हो गई।
हद तो तब हो गई।
जब अस्पताल ने 22 दिनो का बिल 18 लाख बताया।
डाक्टरों ने तत्काल बिल चुकाने के लिए कहा।

डाक्टरो की लापरवाही से हुई मौत

परिजनो का कहना है कि इलाज के दौरान डाक्टरो की लापवाही व लालच की वहज से महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत हुई।
यह हत्या एशियन अस्पताल के डाक्टरो द्वारा पैसे ऐठने की लालच की वजह से की गई।

कमेटी गठित

इस पर संज्ञान लेते हुए उपायुक्त ने पीडित परिवार को आश्वासन दिया है कि:
उपरोक्त सारी घटना की जांच उच्च स्तरीय अधिकारियों से करवाई जाएगी।
जिसके लिए एक कमेटी गठित कर दी गई है।

ये हैं कमेटी में

कमेटी में एसडीएम फरीदाबाद और सीएमओ, बीके अस्पताल शामिल हैं।

परिवार की मांग

परन्तु पीडित परिवार ने मांग की है कि:
जांच कमेटी में न्यायिक अधिकारी को भी शामिल किया जाए।

इस मांग का इन लोगों ने समर्थन किया:

निगरानी कमेटी के मनोनीत सदस्य शिवदत्त वशिष्ठ एडवोकेट,
जिला बार एसोसिएसन के महामंत्री सतबीर शर्मा,
सीताराम,
पवन कौशिक,
महेश नागर,
विजय पाल नागर,
दुष्यंत नागर,
गिर्राज नागर,
मास्टर ज्ञान,
सुरेन्द्र नागर,
सतबीर नागर,
टीकाराम नागर,
पप्पन नागर

इस एशियन अस्पताल का कहना है:

अस्पताल पर लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद है।
मरीज श्वेता को एशियन अस्पताल में 13 दिसंबर, 2017 को भर्ती किया गया।
मरीज को तकरीबन 3 हफते से बुखार था।
मरीज को 7 माह का गर्भ भी था।

इलाज बाहर भी हुआ

इससे पहले मरीज का इलाज बाहर चल रहा था।
अस्पताल में लाने के बाद मरीज को आईसीयू में रखा गया।

परिवारजनों को समझाया था

बीमारी और बच्चे के बारे में सारी स्थिति और बीमारी की गंभीरता को परिवारजनों को समझा दिया गया था।
समय से पहले डिलीवरी न हो इसके लिए दवाईयां, एंटीबायोटिक सभी दी जा रही थीं।
तबीयत में थोड़ा सुधार होने पर तीसरे दिन स्वेता को वार्ड में शिफ्ट किया गया।

प्रसव पीड़ा

वहां पर मरीज को प्राकृतिक प्रसव पीड़ा होने लगी।

टैस्ट हुए

परंतु उसकी डिलीवरी के नजरिए से PT/APTT (खून रोकने के तत्व) कराया गया।
जिसमें वो तीन गुना पाया गया।

डिलीवरी आईसीयू में

जिसकी वजह से मरीज को वापिस आईसीयू में शिफ्ट कराया गया।
प्लेटलेट और खून रोकने वाले तत्व अरेंज कराए गए।
रात में डिलीवरी आईसीयू में की गई।
जिसमें मृत बच्ची का जन्म हुआ।

धड़कन कम भी हुई

दर्द के दौरान बच्चे की धड़कन कम भी हुई थी।
जिसके लिए लडकी के पिता और पति ने सिजेरियन डिलीवरी कराने से मना कर दिया।
डिलीवरी के बाद भी मरीज की हालत खराब होती गई।

पेट में मल

पेट का दर्द भी बढ़ रहा था।
जिसके बाद सर्जन को दिखाया गया।
तो पता चला कि टायफाॅइड की वजह से आंतें फट गईं थीं।
और पेट में मल फैला हुआ था।
डाॅक्टर ने तुरंत आॅपरेशन किया।
किंतु आॅपरेशन के बाद भी मरीज की हालत काफी गंभीर थी।
जिसके कारण मरीज को आईसीयू में ही रखा।

परिजनों ने मना कर दिया

रोज मरीज की हालत के बारे में घरवालों को बताया जाता था।
मरीज को सरकारी व गैर सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह भी दी गई।
जिसके लिए परिजनों ने मना कर दिया था। .

शव ले जाने की अनुमति

मरीज की हालत बता कर नियमित रूप से उनकी लिखित में सहमति ली गई।
मरीज की हालत में सुधार नहीं हुआ।
और उसकी 5 जनवरी  2018 को रात 11 बजकर 45 मिनट पर मौत हो गई।
मरीज को रिश्तेदारों को मृत शरीर ले जाने की सहमति अस्पताल ने तुरंत दे दी।

कर्मचारी को पीटा

मरीज के रिश्तेदारों ने बिना कारण हमारे कर्मचारी को पीटा और तोड़-फोड़ की।
मरीज के रिश्तेदारों का यह आरोप बिल्कुल गलत है कि हमने रूपयों के लालच में इलाज नहीं किया।

बकाया राशि नहीं देना चाहते परिजन

यदि ऐसा होता।
तो मरीज का इतना रूपया बकाया नहीं होता।
परिवार की इच्छा अस्पताल को बकाया राशि देने की नहीं थी।
जिसके कारण ही उन्होंने अस्पताल परिसर में हंगामा किया।
और अस्पताल पर लापरवाही का संगीन आरोप लगाया।
जबकि अस्पताल की तरफ से इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई है।

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