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पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों की बगावत से मचा हड़कंप: लगाए गंभीर आरोप 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों की बगावत से मचा हड़कंप – सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने आज मीडिया के सामने सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। जब सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी बात न्यायायिक प्रशासन के समक्ष रखी। किंतु नाउम्मीद रहने पर उन्होंने मीडिया जैसे सार्वजनिक सार्वजनिक मंच का उपयोग किया। विधि विशेषज्ञ इसे न्यायपालिका के इतिहास में काला दिन मान रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों की बगावत से मचा हड़कंप

जिन 4 जजों ने मीडिया के समक्ष प्रेस वार्ता को संबोधित किया। उनमें न्यायधीश चेलमेश्वर, न्यायाधीश मदन लोकुर, न्यायधीश कुरियन जोसेफ और न्यायाधीश रंजन गोगोई शामिल हैं।
न्यायाधीशों ने मीडिया के समक्ष कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

न्यायाधीशों के आरोप:

जब उनके समक्ष कोई विकल्प नहीं बचा।
तब उन्होंने अपनी बात मीडिया के समक्ष रखने का निर्णय लिया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए की है।

ताकि 20 साल बाद उन पर यह आरोप न लगे कि उन्होंने आत्मा बेच दी थी।
देश को मुख्य न्यायाधीश पर फैसला करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा है।

लोकतंत्र खतरे में

इसलिए देश का लोकतंत्र खतरे में है।
कुछ अनियमितताओं को लेकर इन चारों जजों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था।
मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात भी की थी।
मुख्य न्यायाधीश को बताया था कि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज ठीक ढंग से नहीं हो रहा है।

जो चल रहा है, वह ठीक नहीं है।

अब न्यायपालिका की निष्ठा पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं।

पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।

मुख्य न्यायधीश ने इन चारों न्यायाधीशों के पत्र में वर्णित अनियमितताओं पर कोई कार्यवाही नहीं की।

मुख्य न्यायधीश पर महाभियोग

देश अब यह तय करे कि मुख्य न्यायधीश पर महाभियोग चलाया जाए या नहीं।
कुछ महीनों से कई गड़बड़ियां हो रही हैं।
लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी महत्वपूर्ण संस्था ठीक ढंग से कार्य करे।

इन चारों जजों के पत्र के मुख्य बिंदु:

मुख्य न्यायाधीश के पास सुप्रीम कोर्ट के कामकाज को सुचारु रुप से चलाने के लिए रोस्टर बनाने का अधिकार होता है।
किंतु इससे उन्हें कोई वरिष्ठ अथॉरिटी नहीं बन जाता।

अन्य न्यायाधीश छोटे या बड़े नहीं

मुख्य न्यायाधीश अपने अन्य समकक्षों के मुकाबले ऊपर नहीं हो सकते।
संविधान के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश प्रथम जरूर हैं।
किंतु अन्य न्यायाधीशों से छोटे या बड़े नहीं।

मुकदमों का बंटवारा

मुकदमों को मेरिट के आधार पर ही बैंचों को सौंपा जाए।
महत्वपूर्ण केसों को मुख्य न्यायाधीश अपनी पसंद की बैंचों के हवाले करते हैं।
उम्मीद की जाती है कि मुकदमों का बंटवारा तर्कसंगत तरीके से किया जाए।
पत्र में केसों का ज्यादा विवरण इसलिए नहीं दिया गया।
ऐसा करने से सुप्रीम कोर्ट को शर्मसार होना पड़ सकता है।

एक केस का हवाला:

मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर पर अंतिम निर्णय में विलंब न किया जाए।
(उल्लेखनीय है कि मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के विलंब से न्यायाधीशों की नियुक्तियों में विलंब होता है।)
मुख्य न्यायधीश कॉलेजियम और सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों से मशविरा करके ही सुधारात्मक कार्यवाही करें।
इस घटनाक्रम पर देश का हर वर्ग उद्वेलित है।

वरिष्ठ वकील उज्जवल निकम ने कहा:

यह निराशाजनक है।
आज न्यायपालिका का काला दिन है।
इस प्रेस कांफ्रेंस के दुष्परिणाम सामने आएंगे। 

अब न्यायपालिका के निर्णयों को संदेह की नजरों से देखा जाएगा। 

लोग निर्णय ऊपर सवाल उठाने लगेंगे।

वकील प्रशांत भूषण ने कहा:

मुख्य न्यायाधीश ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है।
कोई न कोई तो उनका विरोध करता ही।

दुर्भाग्यपूर्ण

इन न्यायाधीशों का मीडिया से मुखातिब होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
हालांकि न्यायाधीशों ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाया है।

एडवोकेट केटीएस तुलसी ने कहा:

बहुत मजबूरियों में ही इन न्यायाधीशों ने यह कदम उठाया है।
इन न्यायाधीशों के चेहरे का दर्द स्पष्ट देखा जा सकता है। 

पूर्व न्यायाधीश आरएस सोढ़ी ने कहा:

इन चारों न्यायधीश पर महाभियोग चलाया जाना चाहिए। 
क्या इन चारों जजों के पास बयानबाजी के अलावा कोई काम नहीं था।
इस बयानबाजी के बाद अब इन चारों जजों को सुप्रीम कोर्ट में बैठने का अधिकार नहीं रह गया है।

लोकतंत्र के लिए संसद और पुलिस है

देश का लोकतंत्र खतरे में है।
तो उसके लिए संसद और पुलिस है।

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